this is a hindi translation of an article published in the Times of India, titled "Please hear what I'm not saying" by Jil Zevlok - solak.
केवल सच्चा प्यार ही हमारे उन नकली मुखौटों को भेद सकता है, जिनसे हमने अपनी रूहों को ढक रखा है, मानना है Jil Zevlok – Solak का।
मेरे झांसे में मत आओ। मेरे चहरे पर मत जाओ। क्योंकि मैंने नकाब पहना हुआ है --- मैंने हज़ारों नकाब पहने हैं,..... नकाब जिन्हें उतारने से मैं डरता हूँ, पर इन नकाबों में से कोई भी असली 'मैं' नहीं हूँ। छलावा तो मेरी आदत ही बन गयी है। पर इस छ्लावे में मत आओ, भगवान के लिए इस झांसे में मत आओ। मैं तुम्हे ऐसा प्रतीत कराता हूँ कि मैं सुरक्षित हूँ, कि मेरे साथ सब कुछ बढ़िया है, मेरे अन्दर भी और मेरे बाहर भी…… कि आत्मविश्वास मेरा दूसरा नाम है, ______ मेरा अंदाज़ है, और मैं बहुत ही 'कूल' हूँ, कि मेरे अन्दर की धारा शांत है और सब कुछ मेरे नियंत्रण में है। और मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं। पर मेरा विश्वास मत करो, मैं तुमसे विनती करता हूँ।
मेरी सतह शांत ज़रूर लगती है, पर मेरी सतह मेरा नकाब है, मुझे निरंतर छिपाने वाला नकाब। इसके पीछे कुछ भी शांत नहीं है, सुरक्षित नहीं है। इसके पीछे मेरा असली रुप है --- confused, सहमा हुआ, और बेहद अकेला। लेकिन मैं इसे छिपाता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई भी इसे जान पाये। अपनी कमजोरियों और भय के प्रत्यक्ष आने की कल्पना से ही मैं सिहर उठता हूँ। यही कारण है कि मैं बदहवासी से एक नकाब बनाता हूँ जिसके पीछे मैं छिप सकूं। एक casual दिखने वाला नकाब, परिष्कृत नकाब, जो एक छलावे को रचने में मेरी मदद कर सके…… मुझे उस निगाह से बचा पाये जो मुझे भीतर से जानती है।
पर यही तो वह निगाह है जो मुझे मुक्ति दे सकती है। यही मेरी मुक्ति का अकेला ज़रिया है, और मैं यह जानता हूँ। लेकिन तभी जब यह मुझे स्वीकार कर पाये, अगर मुझे प्यार दे पाए। केवल यही मुझे मुझसे आज़ाद करवा सकती है, मेरे अपने द्वारा ही बनाए गए जेल की दीवारों से, उन किलों से जो खुद मैंने ही अथक प्रयास से बनाए हैं।
केवल यही वह चीज़ है जो मुझे भरोसा दिला सकती है, जो मैं स्वयम को नहीं दिला सकता --- कि मैं सचमुच किसी काबिल हूँ। लेकिन मैं तुम्हे यह नहीं बताता। मुझमे हिम्मत ही नहीं है। मैं डरता हूँ। मुझे डर है मैं तुम्हारी नज़रों में गिर जाऊंगा, कि तुम मुझपर हंसोगे और तुम्हारी हंसी मुझे मार डालेगी। मैं डरता हूँ कि भीतर से मैं कुछ भी नहीं हूँ, खाली हूँ, किसी काम का नहीं हूँ……। और तुम इसे देख लोगे और मुझे अस्वीकार कर दोगे।
इसीलिये मैं यह खेल खेलता हूँ, मेरा बदहवास, छ्लावे का खेल --- बाहर से आत्मविश्वास की मूर्ति सा प्रतीत होता हुआ, मगर अन्दर ही अन्दर एक बच्चे सा कांपता हुआ।
और इस खेल के साथ ही मुखौटों का एक सिलसिला शुरू होता है। और मेरा जीवन एक झूठ बन जाता है। मैं तुमसे इधर-उधर की बातें करता हूँ…… एक suave और सतही लहजे में। मैं तुम्हे उस सब के बारे में बताता हूँ जो असल में कुछ है ही नहीं। और जो सब कुछ है, जो मेरे अन्दर फूट-फूट कर रो रहा है, उसके बारे मैं एक शब्द भी नहीं कहता। इसीलिये जब मैं अपना ये रूटीन दोहरा रहा हूँ, तो मेरे कहने पर मत जाओ।
प्लीज़ ध्यान से सुनो और वो सुनने की कोशिश करो जो मैं नहीं कह रहा --- जो मैं चाहता हूँ की कह पाऊँ, जो जिन्दा रहने के लिए मुझे कहना ज़रूरी है, पर फिर भी नहीं कह पाता। मुझे छिपाने से चिढ़ है। सचमुच। जो ऊपरी खेल मैं खेल रहा हूँ, यह छलाने वाला खेल, मुझे इससे चिढ़ है। मैं सचमुच सच्चा, खरा और स्वतः होना चाहता हूँ, मैं 'मैं' होना चाहता हूँ। लेकिन इसके लिए तुम्हे मेरी मदद करनी होगी। तुम्हे अपना हाथ बढाना पड़ेगा, चाहे कितना ही लगे कि मुझे इसकी कतई ज़रूरत नहीं। या चाह नहीं। केवल तुम्ही मेरी आखों से इस 'सांस लेती लाश' सी शून्यता को पोंछ सकते हो। केवल तुम ही मुझे जीवंत कर सकते हो।
जब-जब तुम भले, कोमल और उत्साहित कर देने वाले होते हो, जब भी तुम समझने की कोशिश करते हो, क्योंकि तुम्हे सचमुच परवाह है, मेरे दिल के पंख उगने शुरू हो जाते हैं। बडे ही कमजोर से पंख, पर पंख…… तुम्हारी संवेदना और empathy, और तुम्हारे समझ पाने की ताक़त के द्वारा तुम मुझमे जान फूँक सकते हो। मैं चाहता हूँ कि तुम यह जानो।
मैं चाहता हूँ कि तुम जानो कि तुम मेरे लिए कितने महत्वपूर्ण हो, कैसे तुम मेरे अन्दर जो 'मैं' है उसके सह-निर्माता बन सकते हो। अकेले तुम ही हो जो उस दीवार को तोड़ सकते हो जिसके पीछे मैं काँपता खड़ा हूँ।
अकेले तुम मुझे भय और अनिश्चतता के नरक से निकाल सकते हो। मेरे अकेलेपन की जेल से मुझे छुड़ा सकते हो। इसीलिये मुझे अनदेखा कर के मत निकलो। यह करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा। इतनी बड़ी, ढृढ़ता से बनी दीवार बहुत मज़बूत होगी। तुम जितना मेरे पास आओगे मैं उतना ही अंधाधुंध तुमपर वार करूंगा। मैं उन्ही चीजों से लड़ता हूँ, जिनके लिए मैं तड़पता हूँ। पर मुझे बताया गया है कि प्यार और दोस्ती ताकतवर दीवारों से भी मजबूत होती है…… और इसीसे मेरी उम्मीद बंधी है…… मेरी आख़िरी उम्मीद!
प्लीज़ उन दीवारों को अपनी मजबूती से ढहा दो --- पर धीरे से; क्योंकि एक बच्चा बहुत कोमल होता है। तुम जानना चाहते हो मैं कौन हूँ? मैं वो हूँ जिसे तुम बखूबी जानते हो। क्योंकि मैं तुमसे मिलने वाला हर एक आदमी हूँ!
Saturday, July 14, 2007
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